यरुशलम/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम एवं तनाव कम करने को लेकर हुए प्रारंभिक समझौते ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। इस समझौते के बाद इज़राइल और अमेरिका के बीच नीति संबंधी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं, जबकि इज़राइली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने स्पष्ट कर दिया है कि देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में उनका रुख पहले की तरह कठोर बना रहेगा।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते में 60 दिनों के युद्धविराम, क्षेत्रीय तनाव कम करने तथा समुद्री व्यापार मार्गों को सामान्य बनाने जैसे प्रावधान शामिल हैं। हालांकि इज़राइल के कई नेताओं और सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम जैसी प्रमुख चिंताओं का पर्याप्त समाधान नहीं करता।
प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा कि इज़राइल अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं पर किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा और क्षेत्रीय खतरों के खिलाफ कार्रवाई की स्वतंत्रता बनाए रखेगा। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ मुद्दों पर अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके विचार पूरी तरह समान नहीं हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता इज़राइल के लिए एक नई रणनीतिक चुनौती पैदा कर सकता है। जहां अमेरिका कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देता दिखाई दे रहा है, वहीं इज़राइल ईरान पर अधिक दबाव बनाए रखने के पक्ष में है। इस वजह से दोनों देशों के बीच दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
इज़राइल के भीतर भी इस समझौते को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। विपक्षी दलों और कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों ने सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि इज़राइल को अपनी सुरक्षा नीति स्वतंत्र रूप से तय करने का अधिकार है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौता केवल एक युद्धविराम नहीं, बल्कि मध्य पूर्व की बदलती शक्ति-संतुलन व्यवस्था का संकेत भी हो सकता है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में कदम साबित होता है या फिर नए राजनीतिक और सामरिक विवादों को जन्म देता है।

