मुजफ्फरनगर/लखनऊ: उत्तर प्रदेश के न्यायिक अधिकारी जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। ज्ञानवापी मामले में अपने आदेश को लेकर पहले राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे जज दिवाकर इस बार पिछले तीन महीनों में विभिन्न हत्या के मामलों में 13 दोषियों को मृत्युदंड सुनाने के कारण चर्चा का केंद्र बने हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच जज रवि कुमार दिवाकर ने मुजफ्फरनगर में कई चर्चित हत्या के मामलों की सुनवाई करते हुए कुल 13 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई। इनमें समीर सैफी हत्याकांड, शेखर हत्याकांड और राजबीर सिंह हत्याकांड जैसे मामले शामिल हैं। अभियोजन पक्ष का कहना है कि इन फैसलों से गंभीर अपराधों के खिलाफ कड़ा संदेश गया है। हालांकि, भारतीय कानून के तहत मृत्युदंड के प्रत्येक फैसले की पुष्टि उच्च न्यायालय द्वारा किया जाना आवश्यक होता है और दोषियों को अपील का अधिकार भी प्राप्त है।
ज्ञानवापी मामले से मिली थी राष्ट्रीय पहचान
जज रवि कुमार दिवाकर वर्ष 2022 में वाराणसी के ज्ञानवापी विवाद से जुड़े मामले में सर्वे कराने का आदेश देने के बाद देशभर में चर्चा में आए थे। उनके इस आदेश के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा। बाद में उनका तबादला भी चर्चा का विषय बना।
कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, रवि कुमार दिवाकर उत्तर प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी हैं। उनका जन्म 5 जुलाई 1980 को हुआ था। उन्होंने वर्ष 2009 में न्यायिक सेवा जॉइन की और वर्तमान में मुजफ्फरनगर में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) के रूप में कार्यरत हैं।
लगातार फैसलों से चर्चा तेज
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के महीनों में हत्या के मामलों में लगातार सुनाए गए फैसलों ने जज रवि कुमार दिवाकर को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि, इन मामलों में सुनाई गई मृत्युदंड की सजा अंतिम नहीं मानी जाती और कानून के तहत आगे की न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अंतिम निर्णय प्रभावी होता है।

